ऐतबार के काबिल है मगर धोखा है सच
सच का दरख़्त शायद होगा ज़न्नत में
वहीँ से ज़र्द पत्तों सा टूट गिरता है सच
कितने आफताब हैं और कितने आसमां
घूमते घूमते सच में बहुत घबराता है सच
समझौते तो होते हैं जिंदगी की समझ से
सच बता क्यूँ झूठी कसमें खाता है सच
ज़मीन के गर्भ में धंसा हुए गहरे तक
पानी की धार सा फूट पड़ता है सच
ज़हरीले धुंए में भटक भटक दिन भर
रात भर बेचारा खांसता रहता है सच
रात की सियाही में छुपी और सियाही
अमावस का चाँद भी तो होता है सच
साथ छोड़ रुखसत हुआ वो बीच सफ़र
हाथों की लकीरों सा नहीं होता है सच
कभी लगता है मुफलिस की क़बा सा
कुछ ढका कुछ खुला सा होता है सच
सच के टीले पर उगाये झूठ के पौधे
जडें उखाड़ते ही खुल जाता है सच
शमशान का धुआं और सदियाँ गवाह
ख़ाक में मिलकर भी जिंदा रहता है सच




