सोमवार, 28 जून 2010

हादसे









गुलों का रंग फीका फीका सा है आज
जमीं तले हुआ जरुर हादसा है आज

लगता है तुम्हें पहले भी कहीं है देखा
हर बुत लगता क्यूँ खुदा सा है आज

हर शहर हादसा , हर दिल में हादसा
हादसों का शायद कोई जलसा है आज

हवाओं ने बताया था आकर चुपके से
वहां पे भी कोई तन्हा हमसा है आज

आने वाला कल भी बीत ही जायेगा
बीता कल भी लगता आज सा है आज

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

जंगली फूल










जंगली फूलों की इसमें क्या खता है
खुशबू नहीं उनमें ये उन्हें भी पता है

जड़ ओ जमीन ही बेतासीर हों अगर
गुल बेचारा बेवजह ताउम्र ही रोता है

इंसानों के चेहरे होते हैं अलग अलग
दिल भी सबका एक सा कहाँ होता है

दरिया किनारे दरख्त मुरझाने लगे हैं
बादल भी अब तो सहरा पे बरसता है

शनिवार, 9 जनवरी 2010

बर्फ




जब जब चला करती है हवाए सर्द कहीं
बरसती है दूर पहाडों पे ठंडी बर्फ कहीं

कोई कहे बहरे फ़ना कोई ऐशे दुनियाँ
हैं खुशियाँ कहीं तो है बेइंतेहा दर्द कहीं

ख़ाक में से भी भड़क उठती है चिंगारी
कर ले जब्त सीने में जज्बे ज़र्फ़ कहीं

वक़्त रहते ही दिखाओ इल्म ओ फन
पड़े पड़े हो जाये न आब ए गर्क कहीं

सब राज अफशां हो जायेंगे यकबारगी
छुपा के रखना दिल ही में वो हर्फ़ कहीं

सितारे झिलमिल नहीं करते आजकल
मानो खो गया हो इनका भी वर्क कहीं


रविवार, 15 नवंबर 2009

हिसाब









कहा माहताब ने जाते समय बता कर तो जाया करो
कहा आफताब ने बड़ी ठण्ड है थोड़ा जल्दी आया करो

कहा माहताब ने न हों गर हम तो क्या दिन क्या रात है
कहा आफताब ने न करो इतना गुरुर उसकी कायनात है

कहा माहताब ने परेशान न करो टुकडों में बिक रहा हूँ
कहा आफताब ने धुंए और धुंध से तो मैं भी डर गया हूँ

कहा माहताब ने छतों पर यूँ खुलेआम न घूमा करो
कहा आफताब ने चोरी छुपे खिडकियों से न झाँका करो

कहा माहताब ने ओस की बूँदें तुमसे क्यूँ शर्माती हैं
कहा आफताब ने तुम्हीं पूछो मुझे तो नहीं बताती हैं

कहा माहताब ने ये हैं मेरे आंसूं इन्सां समझता पानी है
कहा आफताब ने छुपा लो दिल में आखिरी निशानी है

कहा माहताब ने तुमसे बातें करके बड़ा अच्छा लगा
कहा अफताब ने सितारों के होते भी तू मुझे तन्हा लगा

कहा महताब ने जल्दी चले जाना वक्त पर आ जाऊँगा मैं
कहा आफताब ने गर्मियों में हिसाब बराबर कर पाऊंगा मैं











मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

मदहोशियाँ






रंगीं खुशबुएँ बिखेरता इक शामों का पेड़ है
जरा संभल के चलना मदहोशियों का पेड़ है

सितारों का गजरा कैसे बिखर गया इस पे
चाँद भी हैरां है शायद जन्नतों का पेड़ है

आगाज़ ए शब की आहट से लगा झूमने
खुशगवार से नगमों और तरानों का पेड़ है

लुटा कर तमाम दौलत खुश होता है बहुत
दिलों के गुलशन में आशिकियों का पेड़ है

पत्ते भी बन जाते हैं लब अक्सर रातों में
हाले दिल कहता है सरगोशियों का पेड़ है

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

खुशबुएँ






राह के उस मोड़ पे इक खुशबुओं का पेड़ है
शाम की जुल्फों से खेलती हवाओं का पेड़ है

रात के दामन से गिर पड़ीं थीं कुछ आरजुएं
उन्हीं से पैदा हुआ है जुस्तजुओं का पेड़ है

जिन्स ओ जात का तो कुछ पता नहीं मगर
पता है तो बस इतना कि वफाओं का पेड़ है

अर्श भी बरसाता है इस पे रहमतें बूंदों सी
कभी कभी लगता है कि खुदाओं का पेड़ है

ख़ाक मल मल कर नहाता है बारिशों में
हर मौसम में खड़ा आजमाइशों का पेड़ है

कुछ खुशनुमा ख्वाब सो रहे हैं शाखों पर
सफर अंजाम है यही उन परिंदों का पेड़ है

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दरीचे










कहा उसने मौसम फ़िर से बदलने लगा है
सोचा मैंने वक़्त हुआ कब किसका सगा है

कहा उसने लगता है कोई छत गिर गई है
सोचा मैंने आवाजों के होते मतलब कई हैं

कहा उसने कुछ करने का आज मन नहीं है
सोचा मैंने जहाँ में कौन है जिसे गम नहीं है

कहा उसने दरीचे बंद कर लो तेज़ हवा है
सोचा मैंने अपनी साँसों से हर कोई खफा है

कहा उसने मज़हबी फसादात कब बंद होंगे
सोचा मैंने बचे 
जब ज़मीं के टुकड़े चंद होंगे