Thursday, September 8, 2011

चादर







धरती  चादर   अम्बर  चादर
इससे  नहीं  है  बेहतर  चादर

माटी  के  ढेले  सा  पड़ा है  वो 
डाल भी दो कोई  उसपर  चादर

ऊपर  चादर  , नीचे  चादर
बस  नहीं  है  अन्दर  चादर

बारिश  भारी  नदिया  बाहर
होने  लगी  तरबतर  चादर

चाँद  सितारे  झांकते  नज़ारे
आसमां  की  कुतरकर  चादर

बाहर  निकलते  लगीं  तड़पने
मछलियों का समुन्दर  चादर

6 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

    बधाई |

    और बधाई ||

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  3. सुंदर शाब्दिक चित्रण..... उम्दा पंक्तियाँ

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  4. चित्र और भावों की अभिव्यक्ति दोनों सुंदर हैं ।

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  5. minuu di
    aapki yah prastuti bin kahe hi bahut kuchh kah jaati hai .
    bahut hi sundart se abhivyakt kiya hai aapnegahan bhav ko
    bahut bahut badhai
    poonam

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