Monday, January 2, 2012

पसंद




बेकली तो बहुत थी और सच्ची ख्वाहिशमंद थी
पर हर वो चीज़ न मिल सकी जो मुझे पसंद थी

कोई गुप्त कारवाई चल रही थी अन्दर
बहुत खटखटाया दरवाज़ा मगर ताली बंद थी

ऐसी ऐसी मौजें उठीं कि तड़प उठे साहिल
दरिया को तो बस जैसे दीवानगी पसंद थी

निकला जब सूरज तो फट पड़े बादल
पड़ा हो कोई परदा रौशनी ऐसी मंद थी

जाना था पूरब में ली गयी वो पश्चिम
हवा भी जाने कैसी बेगैरत और बेसमंद थी

फिकर कर कर जिकर किया था उम्र भर
जिकर का जब काम आया धड़कन बंद थी

जिकर - अभ्यास

7 comments:

  1. बहुत खूब, लाजबाब !
    नव वर्ष पर सार्थक रचना
    आप को भी सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !

    शुभकामनओं के साथ
    संजय भास्कर

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  2. गहरी और अर्थपूर्ण रचना ..

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  3. वाह .. लाजवाब लिखा है ... नए भाव लिए ...

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  4. Nice to see the blog after long gap. Just circled on Google+

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