Saturday, July 30, 2016

आवारा आबशार




दिल्लगियां करने लगा है मेरा प्यारा आब शार
बलखाता , इठलाता हो गया आवारा आब शार


फूल , तिनके , पत्ते  और मिट्टी साथ लेकर
बन बन भटकता रहता है  बंजारा आब शार


बहुत शोर करता है रातों की तन्हाई में
संगीत की धुन सा बजता इकतारा आब शार


ठंडी रात और चमकती बिजली से डरता
तन्हाइयों का मारा है बेचारा आब शार


सैलाबों को बहाता दर्द की कहानी है वो
बारिशों का मारा  बहुत हारा आब शार


रोशन है ज़माना तुझसे दिल्लगी तेरी माफ़ है
डूबती कश्तियों को देता है किनारा आब शार


देवताओं की देन है ये ज़िन्दगी का नूर है
मत छेड़ो इसे देता है इशारा आब शार










5 comments:

  1. वाह ... हर शेर लाजवाब है ... नाजुक एहसास लिए ...

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  2. प्रचण्डOctober 13, 2016 at 10:45 AM

    क्या बात है मीनू जी

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  3. Enjoyed the poem ! But some words could not understand ! 😎😎😎😎! Will take tuition in Urdu

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