Sunday, January 26, 2014

बातें रातों की


गुल ,बुलबुलें, शबनम ,शाखें करते हैं बातें रातों की
झिलमिल तारे जाते जाते कह जाते हैं बातें रातों की

तेज़ हवाओं में भटका था कल रात इक मुसाफिर
क़दमों के निशाँ और टूटे पत्ते कहते हैं बातें रातों की

सिसकी थी कल शमा और जला था कोई परवाना
सूखी बाती और धुंए के निशाँ करते हैं बातें रातों की


बहते पानी पर लिखीं थीं कल रात कुछ तहरीरें
बहते तिनकों और शाखों में ढूंढते हैं बातें रातों की

ठन्डे बहुत थे तारे और खामोश बहुत था चाँद
बर्फ़ीली बूंदों ,सर्द हवाओं से पूछते हैं बातें रातों की



































Saturday, January 18, 2014

mukalmati

पूछा मैंने क्या दरिया को पता है कि सहरा की तिश्नगी है बहुत
कहा उसने क्या सहरा को पता है कि दरिया की बेचैनी है बहुत

पूछा मैंने क्या फूल को पता है कि काँटा दर्द देता  है बहुत
कहा उसने क्या कांटे को पता है कि फूल नर्म होता है बहुत

पूछा मैंने क्या शबनम को पता है कि धूप गर्म होती है बहुत
कहा उसने क्या धूप को पता है कि ओस नर्म होती है बहुत

पूछा मैंने क्या रात को पता है कि चाँद खामोश है बहुत
कहा उसने क्या उस को पता है कि वो करता मदहोश है बहुत

पूछा मैंने क्या शमा को पता है कि परवाना उसे चाहता है बहुत
कहा उसने क्या परवाने तो पता है कि वो उसे रुलाता है बहुत

पूछा मैंने क्या दिल को पता है कि वो धड़कता  है बहुत
कहा उसने क्या उसे पता है कि उसमें लहू दौड़ता है बहुत