Tuesday, July 31, 2012

कतरे


वक्ती  साअतों  को आज  ज़मूद  कर  दूँ
ज़िन्दगी  तुझे मैं  नेस्तनाबूद  कर  दूँ


दरिया  किनारे  है  सीपियों  का  ढेर
दर्द  के  हर  कतरे  को  वजूद  कर  दूँ

उड़ता  फिर  रहा  है  बेसबब  कब  से
क्यूँ  न  बादल   को  बूंदा बूँद  कर दूँ

क़र्ज़  बकाया  है  अब  तक  गुलशन  का
अदा  पहले  खुशबुओं  का  सूद  कर  दूँ

रोज़  रोज़  निगला  करती  है  आफताब
शब  में  छेद  कर इसे  सुबूत  कर  दूँ




3 comments:

  1. वाह ... बागी तेवर लिए ... लाजवाब शेर हैं सभी ...

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  2. उम्दा शेर... बहुत अच्छी ग़ज़ल...बहुत बहुत बधाई...

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