Saturday, May 5, 2012

आकाश




जिस्म  में  गहरे  उतर  आया  आकाश
चाँद  मगर  साथ  नहीं  लाया  आकाश

टकराता  रहता  है  दिल के कोनों से
संभालो  उसे  देखो  लडखडाया  आकाश

उस  पार  से  आई  है  आज  कैसी  सदा
झूम  झूम  के  नाचा  और  गाया  आकाश

कुछ   तो  नज़र  आया  है  अँधेरे  से  परे
बेवजह  ही  नहीं  झिलमिलाया  आकाश

सहम  गाया  है  देखकर  दिल  के  सन्नाटे
आ  तो  गया पर   बड़ा  पछताया  आकाश

आदत  पड़  गयी  है  आफताब  की  इसे
इतने  दिन  दूर  रहकर  घबराया  आकाश

खामोश  ही  सही  ज़िन्दगी  चलती  तो  है
नस  नस  में  जब  से  समाया  आकाश

सर्द  रिश्तों  को  देख  सहमा  हुआ  था
जरा  सी  तपिश  से  पिघल  गया  आकाश

इक  दिन  बैठाया  था  हथेली  पर  उसे
लकीरों  को  देखते  ही  उड़  गया  आकाश





8 comments:

  1. खामोश ही सही....

    फेसबुक न हो तो पता ही चले कि लोग इतनी खामोशी से अपनी संवेदनाओं के निशान लफ्जों के जरिए छोड़ जाते हैं।....

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  2. वाह...बेहतरीन रचना...बधाई

    नीरज

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  3. बहुत सुन्दर भाव!!!
    क्या कहूँ आपकी इस रचना के बारे में, शब्द ही नहीं मिल रहे । बेहद उम्दा रचना

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  4. दिल तक उतरता ग़ज़ल

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  5. उस पार से आई है आज कैसी सदा
    झूम झूम के नाचा और गाया आकाश

    कुछ तो नज़र आया है अँधेरे से परे
    बेवजह ही नहीं झिलमिलाया आकाश

    बहुत खूबसूरत गजल ....

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  6. बहुत खूब .... इस आकाश के दिल का हाल लिख दिया ...
    हर शेर लाजवाब ...

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