Monday, March 12, 2012

इल्जाम
















खता किसी की इल्जाम हमारे सर पर
पता किसी का तूफ़ान हमारे घर पर

मुद्दतें गुजरीं सोचते खतावार है कौन
सुना इन्साफ भी होगा तुम्हारे दर पर

मिले कभी तो पूछेंगे हासिलातों को
अभी चलते हैं अपने अपने सफर पर

हर घर की सेहन की किस्मत है अलग
कहीं सर्द हवा है कहीं धूप शज़र पर

परिंदा उडेगा ही आख़िर फडफडा कर
क्यूँ आसमां लिख दिया उसके पर पर

दूर तक फैला शहर सिमट आया है
क्यूँ न करे गुरुर रास्तों ओ हुनर पर

हयात ए दश्त भी पार कर ही लेंगे
काबू बनाये रखा अगर अपने डर पर

5 comments:

  1. खता किसी की इल्हाम हमारे सर पर
    पता किसी का तूफ़ान हमारे घर पर


    वाह वाह .....मत्ला तो कमाल का उतरा है मीनू जी ......

    ReplyDelete
  2. गज़ब का मतला है ... हर शेर नए अंदाज़ का है ...
    बहुरत खूब ..

    ReplyDelete