Wednesday, August 10, 2011

आज़ादी





राम  ओ रहीम  की बात  ख्याल  ए खाम  हो  चली  है
सियासती  बुग्ज़  में  दब  शहीद  ए  आम  हो  चली  है

शोब्दाकारों  के  शोर  से  हैरां हैं  संसद  की  दीवारें
दरकने  लगीं  शायद  इनकी  भी  शाम  हो  चली  है

अब  के  शतरंज  में  पियादे  न  काले  न  सफ़ेद
आँखों  की  रोशनी  जैसे  तमाम  हो  चली  है

आखिरी  चिराग   है  अपने  दामन  का  सहारा  दे  दो
की  हर  दरीचे  से  आती  हवा  इमाम  हो  चली  है

आज़ादी  तेरे  नाम  पर  कुछ  नामचीनों  की  बदमिज़ाजी 
मेरे  अजीजों  की  शहादत   जैसे  इल्जाम  हो  चली  है 

Saturday, August 6, 2011

साये










अक्सर इंसानों को घेर लेते हैं साए 
कभी खुशनुमा कभी उदास होते हैं साये 

अज़ल से चले आये हैं साथ साथ 
साथ ज़िन्दगी के छूट जाते हैं साए 

पिन्हा होते हैं जिस्म के लहू में 
बन आरजुएं उभर आते हैं साए 

रौशनी के साथ तो चलती है दुनियां 
अंधेरों में साथ बस देते हैं साए 

बन कर दिन और रात मिला करते हैं 
ज़मीन आसमान के भी होते हैं साए