Monday, May 16, 2011

तहज़ीब






दरख़्त उखाड़ फेंकने की भी होती है तहज़ीब
बता तो दो उसकी खता यह कहती है तहज़ीब

मज़हब हों या फूल सबकी अपनी क्यारी है 
छेड़ने से इन दोनों की मर जाती है तहज़ीब 

बिन बुलाये मेहमान सी बेवक़्त आ गयीं 
यादों को आने की कब होती है तहज़ीब 

दम तोड़ते ही लिटा दिया फर्श पर इंसान 
बस शमशान तक साथ चलती है तहज़ीब 

बेहतर है ये जहाँ अब ए मौला बाज़ीगर 
साँसों की आजकल कपालभाति है तहज़ीब  

शमा के पास ही होंगे हिसाब ए जफा ओ वफ़ा 
परवाने को कब जलने की आती है तहज़ीब 

Sunday, May 1, 2011

सच





सच में सब सच सा नहीं होता है सच
ऐतबार के काबिल है मगर धोखा है सच 

सच का दरख़्त शायद होगा ज़न्नत में
वहीँ से ज़र्द पत्तों सा टूट गिरता है सच

कितने आफताब हैं और कितने आसमां
घूमते घूमते सच में बहुत घबराता है सच 

समझौते तो होते हैं जिंदगी की समझ से 
सच बता क्यूँ झूठी कसमें खाता है सच 

ज़मीन के गर्भ में धंसा हुए गहरे तक 
पानी की धार सा फूट पड़ता है सच 

ज़हरीले धुंए में भटक भटक दिन भर 
रात भर बेचारा खांसता रहता है सच 

रात की सियाही में छुपी और सियाही 
अमावस का चाँद भी तो होता है सच  

साथ छोड़ रुखसत हुआ वो बीच सफ़र 
हाथों की  लकीरों सा नहीं होता है सच 

कभी लगता है मुफलिस की क़बा सा 
कुछ ढका कुछ खुला सा होता है सच 

सच के टीले पर उगाये झूठ के पौधे 
जडें उखाड़ते ही खुल जाता है सच 

शमशान का धुआं और सदियाँ गवाह 
ख़ाक में मिलकर भी जिंदा रहता है सच