Friday, July 2, 2010

जिस्म




सांसों और धडकनों की साजिश है जिस्म
रग रग में सुर्ख रंग की आराइश है जिस्म

गला दबाया हो जैसे और घुट रही हों सांसें
इन्तहा ए दर्द की ही तो पैदाइश है जिस्म

रिश्तों के जंगल में खड़ा है इक दरख़्त सा
गुलों शाखों पत्तों सी आज़माइश है जिस्म

बाहें पसारे खड़ी हैं दोनों तरफ बेमुर्रव्वत
हयात और कज़ा की फरमाइश है जिस्म


आसमान जो कुछ और बह चले दरीचों से
इक मुट्ठी खामोशी की गुंजाइश है जिस्म

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर!!

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  2. खुबसूरत शेर दिल की गहराई से लिखा गया बधाई

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  3. अंदाज़ भी अच्छा है, आग़ाज़ भी अच्छा है
    मीनू का देखो शौक़-ए-परवाज़ भी अच्छा है

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  4. और आपके दाद देने का अंदाज़ भी अच्छा है

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  5. Bahut khoob Meenu ji---sundar rachana.

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