Tuesday, October 13, 2009

मदहोशियाँ






रंगीं खुशबुएँ बिखेरता इक शामों का पेड़ है
जरा संभल के चलना मदहोशियों का पेड़ है

सितारों का गजरा कैसे बिखर गया इस पे
चाँद भी हैरां है शायद जन्नतों का पेड़ है

आगाज़ ए शब की आहट से लगा झूमने
खुशगवार से नगमों और तरानों का पेड़ है

लुटा कर तमाम दौलत खुश होता है बहुत
दिलों के गुलशन में आशिकियों का पेड़ है

पत्ते भी बन जाते हैं लब अक्सर रातों में
हाले दिल कहता है सरगोशियों का पेड़ है

3 comments:

  1. मैं अपनी प्रतिक्रिया किस तरह दूं...अच्छा ऐसा करता हूं कि दो लाइन लिखने की कोशिश करता हूं अपनी बात कहने के लिए -

    उनके गजलों की खुशबू बिखेरता हम सबका यह आबशार है
    कुछ आरजू नहीं, बस सलामत रहे क्योंकि यह एक पेड़ है

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ इस शानदार गजल के लिए अनंत बधाइयां।

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  2. रंगीं खुशबुएँ बिखेरता इक शामों का पेड़ है
    जरा संभल के चलना मदहोशियों का पेड़ है

    बहुत खूब ....!!

    सितारों का गजरा कैसे बिखर गया इस पे
    चाँद भी हैरां है शायद जन्नतों का पेड़ है

    मीनू जी गज़ब का लिखतीं हैं आप ....!!

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  3. shukriya , kirmani ji , shukriya Haqeer

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