Saturday, September 19, 2009

दरीचे










कहा उसने मौसम फ़िर से बदलने लगा है
सोचा मैंने वक़्त हुआ कब किसका सगा है

कहा उसने लगता है कोई छत गिर गई है
सोचा मैंने आवाजों के होते मतलब कई हैं

कहा उसने कुछ करने का आज मन नहीं है
सोचा मैंने जहाँ में कौन है जिसे गम नहीं है

कहा उसने दरीचे बंद कर लो तेज़ हवा है
सोचा मैंने अपनी साँसों से हर कोई खफा है

कहा उसने मज़हबी फसादात कब बंद होंगे
सोचा मैंने बचे 
जब ज़मीं के टुकड़े चंद होंगे

2 comments:

  1. इस आबशार में इतनी खूबसूरती...

    कहा उसने इन्सां के साथ ख्वाहिशें नहीं मरतीं
    कहा मैंने ख्वाहिशों का जिस्म ही कहाँ होता है

    ...सामने आ जाए वो अगर, मैं कहूं...मुकर्रर

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